हरिद्वार, ब्यूरो। इंडियन फार्मा इंडस्ट्री द्वारा फार्मा दवाओं के उत्पादन के लिए कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले आइसो प्रोपील एल्कोहल का 88 प्रतिशत नॉन–आईपी (इंडियन फार्माकोपिया) ग्रेड रहता है। इस वजह से भारतीय उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य तथा भलाई और इंडियन फार्मा इंडस्ट्री की प्रतिष्ठा खतरे मे है।
रेगुलेटरी (नियामक) एक्सपर्ट विजयकुमार सिंघवी महाराष्ट्र सरकार में ऍफ़डीए में टेक्नीकल ऑफिसर रह चुके हैं। उनके अनुसार, दवा और कॉस्मेटिक अधिनियम की दूसरी अनुसूची की धारा 16 में फार्मा एप्लीकेशन के लिए आईपी स्पेक्स के उपयोग को अनिवार्य किया गया है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि फार्मा इंडस्ट्री में उपभोग किए जाने वाले अधिकांश आईपीए को नॉन–आईपी ग्रेड के रूप में खरीदा जाता है। फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री में उपयोग किया जाने वाला नॉन–फार्मा ग्रेड आईपीए विभिन्न फार्माकोपिया स्टैण्डर्ड में शामिल विभिन्न महत्वपूर्ण पैरामीटर्स को पूरा करने में असफल हो सकता है। इन पैरामीटर में यूवी अवशोषण टेस्ट, बेंजीन और आर पदार्थ, और नॉन–वोलाटाइल अवशेष/पदार्थ, अम्लता या क्षारीयता का परीक्षण शामिल होता है। श्री सिंघवी ने आगे कहा, इन पैरामीटर को पूरा न करने की वजह से घटिया मैटेरियल का उपयोग होता है और जिससे दवा की क्वालिटी कम हो जाती है।
Related Stories
August 14, 2022